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Friday, September 25, 2026

दुःखद खबर-वयोवृद्ध नेता हरि सिंह राणा का निधन, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों में शोक की लहर

दुःखद खबर-वयोवृद्ध नेता हरि सिंह राणा का निधन, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों में शोक की लहर




उत्तरकाशी।।जनपद के सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक सक्रिय रहे मार्गदर्शक पूर्व ब्लॉक प्रमुख डुंडा एवं अष्टादश महापुराण समिति उत्तरकाशी के अध्यक्ष वयोवृद्ध नेता हरि सिंह राणा का 94 वर्ष की उम्र में  निधन हो गया उनके निधन से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है। निधन की सूचना मिलते ही सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त है।अंतिम संस्कार कल 26 सितंबर को केदार घाट (मोक्ष घाट) में होगा।


 

पूर्व विधायक गंगोत्री विजयपाल सिंह सजवाण ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया। पूर्व विधायक ने  कहा कि हरि सिंह राणा  का निधन मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से और पूरे उत्तरकाशी के सामाजिक जीवन के लिए अपूरणीय क्षति है। वे केवल एक वरिष्ठ नेता ही नहीं, बल्कि राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में सदैव मार्गदर्शन और स्नेह प्रदान करने वाले अभिभावक के समान थे। उनके साथ बिताए आत्मीय क्षण, उनका सहज व्यक्तित्व और मार्गदर्शन सदैव मेरी स्मृतियों में जीवंत रहेगा।”सजवाण ने शोक संतप्त परिवार, शुभचिंतकों और समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।


-:सरल व्यक्तित्व, समाज को जोड़ने वाले नेता थे हरि सिंह राणा 


हरि सिंह राणा जनपद के  उन वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों में से थे जिन्होंने पद से अधिक समाज सेवा को महत्व दिया। डुंडा विकासखंड के ब्लॉक प्रमुख के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास, सड़क, शिक्षा और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के लिए कार्य किया। वे गांव-गांव जाकर लोगों से सीधा संवाद रखने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे। उनका धार्मिक जीवन में भी गहरा योगदान रहा। अष्टादश महापुराण समिति, उत्तरकाशी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने उत्तरकाशी की धार्मिक और पौराणिक परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महापुराण आयोजनों को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखकर उन्होंने इसे सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बनाया।वरिष्ठ होने के बावजूद वे हमेशा युवाओं के बीच सहजता से घुल-मिल जाते थे। राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर वे सभी के लिए अभिभावक तुल्य थे। उत्तरकाशी के कई युवा जनप्रतिनिधि उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।उनका जीवन सादगी, सेवा और समर्पण का प्रतीक था। उनका जाना उत्तरकाशी के सामाजिक जीवन में एक युग का अंत है।

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