उत्तरकाशी-पंचकोसी वारूणी यात्रा 17 मार्च को, मान्यता है यात्रा करने से 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का मिलता पुण्य लाभ मनोकामना होती पूर्ण - PiyushTimes.com | Uttarkashi News

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Friday, March 13, 2026

उत्तरकाशी-पंचकोसी वारूणी यात्रा 17 मार्च को, मान्यता है यात्रा करने से 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का मिलता पुण्य लाभ मनोकामना होती पूर्ण

उत्तरकाशी-पंचकोसी वारूणी यात्रा 17 मार्च को, मान्यता है यात्रा करने से 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का मिलता पुण्य लाभ मनोकामना होती पूर्ण



उत्तरकाशी।।जनपद में वरुणावत पर्वत की वारुणी यात्रा का आयोजन इस वर्ष 17 मार्च  चैत्र मास की त्रयोदशी को होगी। प्रतिवर्ष पंचकोसी वारुणी यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु वरुणावत पर्वत की परिक्रमा करने के बाद पुण्य अर्जित करते हैं।वारुणी यात्रा में उत्तरकाशी जनपद ही नहीं बल्कि अन्य जनपदों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार यह वारुणी यात्रा 17 मार्च को चैत्र मास की त्रयोदशी पर होगी। पंचकोसी वारुणी यात्रा का आयोजन बनारस की काशी के तरह प्राचीन काल से होता आ रहा है।चुंगी बड़ेथी से शुरू होने वाली इस यात्रा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु बडेथी में वारुणा और गंगा के संगम में स्नान करने के बाद बसुंगा, साल्ड, ज्ञाणजा, शिखरेश्वर होते हुए संग्राली, पाटा, गंगोरी में पहुंचते है। जो एक दिन में पूरी होती है। संग्राली गांव के आचार्य दिवाकर नैथानी और ज्ञाणजा गांव के पंडित शिव प्रसाद भट्ट ने बताया कि इस यात्रा से मनोकामना की पूर्ति के साथ ही 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा अर्चना का पुण्य लाभ मिलता है। यात्रा करने से निश्चित ही हर श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। प्राचीनकाल में वरुणा एवं भागीरथी के संगम पर स्नान के बाद खरवां, कवां, भराणगांव, ऊपरीकोट, मंदणभित्ती, गजोली, संगमचट्टी होते हुए गंगोरी में अस्सी गंगा एवं भागीरथी के संगम पर स्नान के साथ वृहद पंचकोसी यात्रा संपन्न होती थी। तीन दिन की इस दुर्गम यात्रा में अधिकांशत: साधु संन्यासी ही जाते थे।लेकिन अब एक दिन में वारुणी यात्रा होती है। जो इसी माह 17 मार्च को चैत्र मास की त्रयोदशी को होगी। इसमें श्रद्धालु बडेथी में गंगा स्नान के बाद बड़ेथी में वरुणेश्वर, बसूंगा में अखंडेश्वर, साल्ड में जगतनाथ, अष्टभुजा दुर्गा, ज्ञाणजा में ज्ञानेश्वर एवं व्यास कुंड, वरुणावत शीर्ष पर शिखरेश्वर, विमलेश्वर महादेव, संग्राली में कंडार देवता, पाटा में नर्वदेश्वर मंदिर के दर्शन के बाद गंगोरी पहुंचेंगे और  अस्सी गंगा और भागीरथी में स्नान के बाद उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक करेंगे।

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